गीता

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं – पर डर सा लगता है – शुरू करते हुए भी – कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों – आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ – यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो – तो you are welcome to comment – फिर डिस्कशन करेंगे ….


और – मैं इतना कहना चाहूंगी शुरुआत में – कि अक्सर लोग सोचते हैं – कि यह धार्मिक कथाएँ “बोरिंग” होती हैं – जबकि असल में इसका उल्टा है | ये बड़ी इंट्रेस्टिंग हैं – यदि न होतीं – तो कभी समय की कसौटी पार कर हजारों सालों से हमारे साथ न होतीं | जब हम अच्छी फिल्में देखते हैं – जैसे थ्री इडीयट्स , बाग़बान आदि – तो उन्हें बहुत पसंद करते हैं – प्रशंसा के पुल बंधते हैं – और ६ महीने में भूल जाते हैं | आखिर इन मायथोलोजीकल कहानियों में कुछ ख़ास तो होगा न – जो उन्हें सदियों से जीवित रख सका है? तो मेरी आपसे रिक्वेस्ट है – इन्हें बोरिंग न समझें , , आइये – इन्हें साथ पढ़ें – और एन्जॉय भी करें !

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DISCLAIMER :
I am not able to implement all this in real life. I am a student of the Geeta, and just as normal a human being with as normal circumstances as most of the readers here (not all – saome readers may be very high level ideal persons). I am just trying to read / understand / share the Geeta’s message NOT claiming to be a person with the high ideal characteristics intended in the Geeta. I am not a hippocrite, and I do know that I have my limitations and weaknesses. I know many atheist persons who present the verses of the vedas perfectly. Please do not associate me with the perfection of the Geeta (or hippocricy ) just because I am trying to share the nectar I received from it) Krishna says elsewhere in the geeta that four types of persons try to get into this study – and only the highest category are the “gyaani” category. I am not one of them.

मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं – कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ की मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है “ज्ञानी” – और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।
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यह गीता शृंखला , और रामायण कविता मेरे दूसरे ब्लॉग ” आराधना ” पर भी उपलब्ध है 


श्रीमद भगवद गीता  1.1 , 1.2 , 1.3
श्रीमद भगवद गीता 2.12.22.32.42.52.62.72,82.9and 2.10
श्रीमद भगवद गीता 2.112.12 and 2.13, 2.14, 2.15, 2.16, 2.17, 2.18, 2.19, 2.20  

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