संजय उवाच 
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ॥
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाचमधुसूदनः ॥१॥

संजय उवाच संजय ने कहा  
तं (उसे (अर्जुन को) ) तथा (इस तरह)  कृपय (करुणा ) आविष्टम (भरे हुए ) अश्रुपूर्ण (आंसुओं से भरे ) आकुल (परेशान) ईक्षणम् (आँखें) विषीदन्तम (उदास, दुखी, परेशान) इदंम (यह (शब्द ) )वाक्यम (वाक्य) उवाच (कहे) मधुसूदनः (कृष्ण ने) |

संजय बोले – उस परेशान अर्जुन को, जो आँखों में आंसू भरे, और करुणा, दुःख और व्यग्रता से भरा था , श्री मधुसूदन कृष्ण ने यह वाक्य कहे |

गीता का दूसरा अध्याय पूरी गीता का निचोड़ जैसा  है | करीब दस दस  श्लोक हर एक अध्याय को समझाते हैं | पहले दस श्लोक अर्जुन की व्यथित मनोदशा और उसके कारणों के बारे में हैं | वह देखता है कि उसके प्रिय – अतिप्रिय और अपने लोग ही दोनों ही ओर से युद्ध में खड़े हैं | वह दोनों ओर के लोगों से सच्चा प्रेम करता है | उसे डर है ( जो सच ही है ) कि यदि युद्ध हुआ तो वह इन प्रिय जनों में से अनेकों को खो देगा | वह संदेहों से घिर जाता है – कि क्या यह युद्ध करने योग्य है भी ? जो खो जाने वाला है – उसके प्रतिफल के रूप में क्या कोई भी चीज़ काफी हो सकती है ? सोचिये – स्वयं को अर्जुन की जगह रख कर – अपने भाई, परदादा, गुरु – इन सब की मृत्यु के एवज़ में यदि कितना ही बड़ा साम्राज्य मिले – क्या वह सुख देगा ? (अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए – दूसरे की विचारधारा से नहीं)

याद रखने की बात है कि पांडवों की शत्रुता सिर्फ दुर्योधन और दु:शासन से है –  बाकी के ९८ कौरव भाई उनके शत्रु नहीं थे | कुछ से तो लगाव रहा ही होगा – कि सारे भाई एक साथ खेल कूद कर एक साथ बड़े हुए थे |  ना ही उनकी शत्रुता है भीष्म और द्रोण और कृपाचार्य से – जो उस तरफ हैं – और युद्ध का अर्थ होगा उन्हें मार देना – | ना सिर्फ यह कि वे मारे जायेंगे युद्ध में – बल्कि यह कि – अर्जुन अच्छी तरह जानता था कि भीष्म को मारना मेरे अलावा किसी और के बस में नहीं – उन्हें यदि कोई मारेगा – तो मैं खुद ही मारूंगा – और वह भीष्म से अत्यधिक प्रेम करता था – और वे भी उससे उतना ही प्रेम करते थे | तो अर्जुन परेशान था – और युद्ध छोड़ देना चाहता था | 

अब कई लोग कहते हैं कि – यदि कृष्ण सच मुच शान्ति चाहते थे (वे युद्ध के पहले शान्ति-दूत बने थे ) तो वे अर्जुन को इस पल पर युद्ध छोड़ देने देते – तो खून खराबे से बचा जा सकता था | मैं ऐसा नहीं समझती कि यह सही होता | 

पहली बात : ईश्वर ना युद्ध की ओर हैं – ना शान्ति की ओर | वे अनगिनत संसारों की रचना करते ही रहते हैं – और विनाश भी | वे जानते हैं कि यह खूनखराबा सच में नहीं हो रहा – ना किसी की मृत्यु ही हो रही है | जिस तरह से हम जब एक फिल्म या नाटक का खेल देखते हैं , और यदि उसमे हीरो मर जाता है – तब भी हम जानते हैं कि वह कलाकार जो हीरो बना हुआ था, वह मरा नहीं है – जीवित है – और यह सिर्फ खेल है | इसका अर्थ यह नहीं कि हम भ्रमित होकर उदास नहीं होते | जब “मुक़द्दर का सिकंदर ” में अमिताभ मर जाए , या, शाहरुख़ “देवदास” में मर जाए – तो हम जानते हैं कि वह असली जीवन में जीवित है, लेकिन इसका अर्थ यह  नहीं कि हम कुछ देर के लिए उदास नहीं हो जाते इस जगह – वह इसलिए कि हम उस फिल्म के   मूड से जुड़े होते हैं उस  वक़्त | इसी  तरह जब भीष्म ,  अभिमन्यु  आदि  की मृत्यु होती  है , तो कुछ देर कृष्ण भी उदास होते हैं – लेकिन वे जानते हैं कि फिल्म में किस पल किसकी कैसे मृत्यु होने वाली है – और इस के बाद वह व्यक्ति किस रूप में और किस फिल्म में क्या बन कर आएगा | तो उनके लिए मृत्यु वह आखरी मंजिल नहीं है जो हमारे लिए है | उनके लिए वह सिर्फ एक निकास है – एक द्वार जिससे होकर कलाकार एक दृश्य पटल से निकल कर दूसरे दृश्य पटल में प्रवेश करेगा |  

सोचिये कि दो मित्र एक सड़क पर हैं , जो पेड़ों से घिरी है | आगे पीछे मोड हैं – तो आगे रास्ता नहीं दिखता | एक मित्र पेड़ पर चढ़ जाए – तो आगे देख सकता है | वह कहे आगे बैलगाड़ी आ रही है – तो वह सत्य कह रहा है | और जो व्यक्ति भूमि पर खड़ा है वह कहे कि हम सब से जुदा हो गए हैं और अभी नितांत अकेले हैं, तो वह भी अपनी जगह सच ही कह रहा है | फर्क है उनकी स्थिति में, उनके ज्ञान की सीमा में |

इसलिए कृष्ण – जो ज्ञान की परिसीमा से भी परे हैं – वे हंस सकते हैं अर्जुन के भावों पर – क्योंकि उन्हें मोड के उस तरफ की बैलगाड़ी दिखती है | 

एक और बात मैं आपसे पूछूंगी – उनसे – जो कहते हैं कि यह युद्ध रोका जाना चाहिए था – जिससे लोग ना मरते मैं आपसे पूछती हूँ – यदि यह युद्ध ना हुआ होता – तो क्या उस युद्ध में जो लोग मारे गए – वे आज तक जीवित होते? हमारे साथ होते? नहीं –  अपने समय पर जाते ही – और कृष्ण जानते थे कि वह काल अभी है – ऐसे नहीं तो वैसे उन्हें उस वक्त जाना ही था – उन्होंने अर्जुन से कहा भी – इन सब को मैं (काल के रूप में ) पहले ही मार चूका हूँ – तू मारे या ना मारे – यह अपने समय पर मरेंगे ही| तेरे लिए इनकी मृत्यु भविष्य है किन्तु मेरे लिए वह सब वर्त्तमान है – क्योंकि मैं समय से परे हूँ |

इसलिए जब कृष्ण देखते हैं कि अर्जुन मोहित हो रहा है (जैसा वे पहले ही जानते थे कि होने वाला है) तो वे उसे समझाते हैं | यह हम अगली पोस्ट में डिस्कस करेंगे |