क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वैयुपपद्यते |
क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तपः |३|

क्लैब्यं [ कायरता, कमजोरी, नपुंसकता ] मा [मत ] स्म गमः [प्राप्त हो, उस ओर जा ] पार्थ [पार्थ, पृथा (कुंती) के पुत्र, अर्जुन ] न इतत् [नहीं यह ] त्वै [tujhe ]उपपद्यते [शोभा देता है ] क्षुद्रम [तुच्छ ] हृदय [मन की ] दौर्बल्यं [कमजोरी, दुर्बलता] त्यक्त्व [त्याग कर] उत्तिष्ठ [उठ, खड़ा हो जा] परन्तपः [ओ शत्रु को जीतने वाले (अर्जुन का ही एक नाम है परन्तप]


आगे श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं – हे अर्जुन, तू इस कायरता को प्राप्त मत हो – यह तुझे शोभा नहीं देती | तुच्छ ह्रदय की दुर्बलता को त्याग और युद्ध के लिए उठ खड़ा हो जा |

अब अर्जुन है तो एक योद्धा किन्तु इस परीक्षा की घडी में वह कायरता दिखा रहा है | कायरता का अर्थ सिर्फ आपने प्राणों के लिए डरना ही नहीं होता – अर्जुन अपने लिए डरा हुआ नहीं है – वह अपनों के प्राणों की रक्षा के लिए डरा हुआ है – पर है तो यह कायरता ही | तिस पर वह अपने पलायनवाद को अपने ही मन में महानता और त्याग का जामा पहना रहा है | कृष्ण तो फिर महान मनोविज्ञानी हैं ना ? तो वे जानते हैं कि इस मानसिक पंगुता का इलाज है उसके इस “महान” की छवि को एक ज़ोरदार झटका देना | तो  उसके लिए “नपुंसक” जैसा कठोर शब्द कहते हैं | जैसे कि एक आठ साल का बच्चा गिर कर चोट लगने से डर जाता है और आगे बढ़ने से डरता है, तो माँ कहती है – अरे- डरपोक है क्या मेरा बेटा – देख दूसरा कितना बहादुर है | यह एक तरह का “शोंक ट्रीटमेंट” है मनोवैज्ञानिक कृष्ण का अपने रोगी अर्जुन के लिए | “मैं त्याग कर रहा हूँ” की भावना मनुष्य के अहंकार को बहुत ऊंचा कर देती है – तो श्री कृष्ण इस बढ़ते पेड़ को शुरुआत में ही काट दे रहे हैं |  

वे जानते हैं कि अर्जुन कायर नहीं है, नपुंसक नहीं है – वे उसे याद दिला रहे हैं कि तू यह नहीं है , और तू जो करना चाह रहा है वह त्याग नहीं कहलाता – वह कायरता कहलाती है | तू इसे महानता समझने की भूल मत कर | साथ ही वे उसे “परन्तप ” कह कर याद दिला रहे हैं कि तू तो शत्रुओं का नाश करने वाला अर्जुन है, युद्ध से पीठ दिखा कर चले जाना [चाहे निज प्राणों की रक्षा के लिए चाहे प्रियजनों की प्राण रक्षा के लिए ] तेरी फितरत नहीं, तेरा धर्मं नहीं | युद्ध भूमि भावनाओं में बहने का स्थान नहीं है – यहाँ तुझे युद्ध धर्मं निभाना है | निश्चित ही इस युद्ध में अर्जुन बहुत से प्रिय जनों को खोने  वाला था , किन्तु निजी हानि से कहीं अधिक ज़रूरी था अपना धर्मं { कर्त्तव्य} निभाना |

यह बात याद रखने की है कि यह युद्ध अर्जुन पर थोपा नहीं गया है – वह खुद भी इस युद्ध की पृष्ठभूमि का एक अहम् किरदार रहा है | बल्कि युधिष्ठिर और कृष्ण ने तो बहुत कोशिशें की इस युद्ध को रोकने की किन्तु भीम और अर्जुन पर तो तब प्रतिशोध का भूत सवार था | तब भी अर्जुन जानता था कि उसे किन किन से लड़ना होगा (द्रौपदी के चीर हरण के अगले ही दिन भीष्म और द्रोण ने उसे बता दिया था की वे युद्ध में किस और खड़े होंगे ) और वह जानता था कि यहाँ उसे भीष्म और द्रोण का सामना करना होगा | यह भी जानता था कि धर्मं की जीत के लिए यह ज़रूरी है | यह भी जानता था कि इस युद्ध से राज्य “अर्जुन” को नहीं मिलना था -युधिष्ठिर को मिलना था | अर्जुन सिर्फ उनके साथ था | यह युद्ध अर्जुन के लिए था ही नहीं | और यह युद्ध युधिष्ठिर के लिए भी नहीं था , यह तो था न्याय के लिए |

मैं जानती हूँ कि इस युद्ध के लिए अधिकाधिक आरोप धृतराष्ट्र पर लगता है हमेशा, किन्तु ऐसा नहीं है कि जिन भीष्म और द्रोण के मोह में अर्जुन पड़ा हुआ है – वे इस युद्ध की नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त हों | पूछा जाता है अक्सर कि उन दोनो का दोष क्या था – तो –

द्रोण तो खैर राज परिवार के नहीं थे – वे तो बाहर से आये थे – और इस ध्येय के साथ आये थे कि हस्तिनापुर राजकुमारों को शिक्षा देने के बाद गुरुदक्षिणा में अपने मित्र द्रुपद को सजा देने के लिए भेजेंगे – उनकी ज़िम्मेदारी हस्तिनापुर का हित या अहित सोचने की नहीं थी | नीति सिखाने के लिए कुलगुरु कृपाचार्य थे, द्रोणाचार्य शुद्ध रूप से शास्त्र विद्या सिखाने वाले गुरु थे | यह “गुरु” की गरिमा से कुछ थोडा सा नीचे हैं – कि उन्होंने शिक्षा बेचीं थी आपने निजी प्रतिशोध के लिए, और यह चुप रहने और अन्याय का साथ देने की मजबूरी उन्होंने खुद ही मोल ली थी | तो प्रभु की नज़र में वे कोई “बेचारे” नहीं हैं, उनका गुनाह यह नहीं है कि वे द्यूत क्रीडा के दौरान चुप रहे – नहीं – उनका गुनाह यह है कि उन्होंने एक गुरु की मर्यादा को भंग कर के अपने आप को उस स्थान और स्थिति तक पहुंचा दिया कि उन्हें ऐसी स्थिति में भी चुप रहना पड़े | यदि गुरु वशिष्ठ के सामने सूर्यवंश के राजकुमार ऐसा कुछ कर रहे होते, तो वे इस तरह से मजबूर न हुए होते – क्योंकि उन्होंने गुरुधर्म का हमेशा पालन किया और अपने ज्ञान को बेचा नहीं, सिर्फ अपने शिष्यों को दिया – जो कि गुरु का कर्त्तव्य है | 

किन्तु भीष्म ? उनके बारे में जब भी चर्चा होती है , सिर्फ पांडु पुत्रों और धृतराष्ट्र पुत्रों के बीच की खींच तान और अधिकारों को लेकर, और उन्हें “बेचारा” माना जाता है कि वे आपने वचन से बंधे थे | किन्तु यह वचन कोई ऐसा वचन नहीं था जो उन्हें विरासत में मिला हो (उदाहरण के लिए – श्री राम जिस वचन के लिए वन को गए वह उनका अपना वचन नहीं था, उनके पिता का वचन था | ) क्या वचन लेते हुए उन्हें सोचना नहीं चाहिए था? वे हमेशा धृतराष्ट्र को यह समझाते दिखे कि राजा को पुत्र मोह में अँधा नहीं होना चाहिए – तुम वह करो जो राष्ट्र के लिये सही हो | लेकिन – जब उन्होंने आपने पिता का सत्यवती से विवाह करने के लिए यह वचन लिया – तब क्या यह वचन देना  अँधा पिता मोह नहीं था ? ध्यान देने की बात है कि देवव्रत की शिक्षा गंगा ने देवताओं के गुरुजनों के हाथों सौंपी थी | तो जब देवव्रत आपने पिता शांतनु के सत्यवती प्रेम को विवाह में बदलने के लिए प्रतिज्ञा लेने लगे, उससे पहले वे सु-शिक्षित थे – जानते थे कि मैं युवराज हूँ, जानते थे कि युवराज के धर्मं क्या हैं| और युवराज का धर्मं यह कदापि नहीं कि वह एक अनजाने अजन्मे बच्चे के हाथ में आपने फलते फूलते राज्य को सौंप दे | ………….सत्यवती के पिता दासराज जब विवाह से पहले ही यह मांग रख रहे थे कि “मेरी बेटी की संतति ही राज्य करेगी” तो आगे क्या उम्मीदें रखी जाएँ,  क्या सु-शिक्षित युवराज देवव्रत को सोचना नहीं चाहिए था ? उन्हें पुत्र के रूप में पूरा अधिकार है की अपने पिता के लिए प्राण भी दे दें, किन्तु एक युवराज पर राज्य की भलाई की ज़िम्मेदारी होती है – उसे अधिकार नहीं की वह अपने राज्य को अपने पितृ मोह की भेंट चढ़ा दे | आज की दृष्टि से देखें – तो क्या हमारे राष्ट्रपति के पुत्र ऐसा करें हमारे देश के लिये तो उचित माना जाएगा ? बात मोनार्की या डेमोक्रसी की नहीं – बात राज धर्म और राष्ट्र धर्म की है | हम हमेशा युधिष्ठिर को यह दोष देते हैं कि उन्होंने जुए में अपने राज्य, भाई, स्वयं और पत्नी को भी हारने का दांव लगाया | तो क्या जो जुआ देवव्रत ने खेला था अपने  पिता के मोह में – वह इससे भी अधिक खतरनाक नहीं था ?

मैं भीष्म और द्रोण के बारे में यह सब बातें इसलिए कर रही हूँ, कि अक्सर यह कहा जाता है कि द्रोण और भीष्म तो मजबूर थे – इसलिए अर्जुन का संताप उचित था | तो यह ध्यान रखने की बात है कि अर्जुन इन दोनों से बहुत छोटा है – वह इनकी इन गलतियों को देखता ही नहीं | किन्तु श्री कृष्ण तो सब जानते हैं – यह भी कि किसको किस दोष की क्या सजा मिलनी है, और कब और कैसे | तो वे अर्जुन के मोह को तोड़ रहे हैं | जो लोग उनका दोष मानते भी हैं वे सिर्फ इतना कि वे चुप रहे अन्याय होता देख – लेकिन उससे बड़ा दोष है कि सही और गलत का ज्ञान होते हुए भी उन्होंने अपने आप को उस स्थिति तक पहुंचाया कि उन्हें ऐसे वक्त भी चुप रहना पड़े | जिस व्यक्ति को इतना ज्ञान ही ना हो (जैसे सत्यवती के पिता दासराज) उसकी गलतियाँ तो फिर भी माफ़ हो सकती हैं कि वह नहीं जानता क्या सही है और क्या गलत | किन्तु जो जानता है – वह बिना सोचे समझे अपने आप को ऐसी स्थितियों में फंसा ले – तो उसका दोष बहुत अधिक है एक अज्ञानी की अपेक्षा | इसी तरह से , यदि कोई साधारण सैनिक युद्ध से पीठ दिखा कर भाग जाए, तो उसका दोष बड़ा नहीं होगा , किन्तु यदि अर्जुन इस धर्मयुद्ध से जाता, तो उसका गुनाह बहुत भारी होता, क्योंकि वह सु-शिक्षित था और जानता था की क्या सही है और क्या गलत है |

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