न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो- 
  यद्वा जयेमः यदि वा  नो जयेयुः |
यानेव हत्वा न जिजीविषाम –
  स्ते अवस्थिताः  प्रमुखे धार्तराष्ट्राः |६| 
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न नहीं  च भी इतत यह विद्मः जानते  कतरन्नो गरीयो  क्या बेहतर हैं यद्वा  जयेमः / यदि वा  नो जयेयुः हम उन्हें जीत लें/ या वे हमें जीत लें यानेव जिन्हें  हत्वा  मार कर  न नहीं  जिजीविषामः जीने की अभिलाषा  ते वे  अवस्थिताः उपस्थित हैं  प्रमुखे  मुख्यतया हमारे सम्मुख धार्तराष्ट्राः धृतराष्ट के पुत्र | .


अर्जुन ने आगे कहा – हम ये भी नहीं जानते कि क्या बेहतर है (क्या होगा नहीं , बल्कि क्या बेहतर है ) यह कि हम उन पर विजय पाएं, या फिर ये कि हम उनसे हार जाएँ | ये प्रियजन जिन्हें हम मारना नहीं चाहते – जिनकी हत्या कर के जीने की इच्छा ही ना बचेगी – वे ही ध्रुतराष्ट्र के पुत्र आज युद्ध में हमारे सम्मुख उपस्थित हैं | 

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अर्जुन की समस्या है उसका अपने परिवार के प्रति मोह | कृपया याद करें, पांडव (युधिष्ठिर नहीं – बाकी चारों भाई ) दुर्योधन और दुःशासन से बहुत क्रोधित हैं | इन दोनों ने हमेशा पांडवों के साथ छल किया | परन्तु बाकी के कौरव भाइयों से अर्जुन की कोई शत्रुता नहीं है | आखिर ये सब चचेरे भाई हैं, एक ही साथ खेलते कूदते बड़े हुए हैं, एक ही गुरुकुल में पढ़े | कई बहुत ही निकट के सम्बन्ध भी रहे होंगे भाइयों के आपस में | किन्तु जब स्थिति  युद्ध की आ पहुंचे, तो स्वाभाविक तौर पर अधिकतर कौरव भाई दुर्योधन की ओर खड़े हैं | यदि दुर्योधन तक पहुंचना हो (युद्ध के सही समापन के लिए यह ज़रूरी है अर्जुन की नज़र में ) – तो इन सारे भाइयों को मारना ही होगा | 


असलियत में , अधिकतर भाइयों की मृत्यु भीम के माध्यम के द्वारा आयी ,  अर्जुन को ज्यादा प्रिय जनों को मारना नहीं पडा | ……..उसने भीष्म पर बाण अवश्य चलाये , किन्तु उनकी मृत्यु इच्छा मृत्यु थी, ……..सभी कौरव भाइयों को भीम ने मारा – सभी को , ……..गुरु द्रोण को धृष्टद्युम्न ने मारा | हाँ , कर्ण को अवश्य अर्जुन ने मारा, परन्तु तब वह नहीं जानता था कि कर्ण उसका बड़ा भाई है |

और भीम कभी अपना धर्म निभाने में विचलित नहीं हुए, न ९८ कौरवों (जिनसे कोई शत्रुता न थी) को मारने में, न गुरु से झूठ बोलने में | क्योंकि भीम जानते थे कि वे अपने लिए नहीं – धर्म के लिए यह सब कर रहे हैं | तो वे विचलित नहीं होते थे | सिर्फ दुर्योधन और दुःशासन को मारने में भीम का निज “मैं” शामिल था, और वही उनका फल युक्त कर्म था इस पूरे युद्ध में | बाकी भाइयों से लड़ने से पहले भीम उन्हें चेताते भी थे कि “हे भाई, तुमसे मेरी कोई शत्रुता नहीं , पर दुर्योधन तक पहुँचने के लिए तुमसे लड़ना पड़ेगा ही | यदि तुम मुझे न रोको , तो मैं तुमसे न लडूं |” परन्तु वे अपने धर्म पर थे, और दुर्योधन को बचाने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी |


एक और बात – अर्जुन यह नहीं कह रहा कि “अपने भाइयों” को कैसे मारूं | वह कह रहा है कि “ध्रुतराष्ट्र के पुत्रों” को कैसे मारूं, क्या मारना उचित है ? यह अर्जुन की मनः स्थिति दर्शाता है | यदि अब भी ध्रुतराष्ट्र समझ गया होता (यह सब कुछ संजय ध्रुतराष्ट्र को ही सुना रहे हैं ) तो यह युद्ध यहाँ तक आ कर भी रोका जा सकता था | क्योंकि यह जो सेना युद्ध में उतारी है – यह दुर्योधन की नहीं, ध्रुतराष्ट्र की सेना है | 


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