आजकल “ऐक्यवाद” और “द्वैतवाद” पर बड़ा वाद विवाद होता रहता है | [[[कोई लोग तो कहते हैं कि ईश्वर हैं ही नहीं, तो वे इस वाद विवाद का हिस्सा नहीं हैं | ]]]  तो दूसरी ओर, जो मानते भी हैं कि ईश्वर हैं – वे भी दो तरह के हैं | एक वे जो मानते हैं कि ईश्वर एक अलग एंटिटी ” परमात्मा ” हैं और हम “जीवात्माएं” अलग जो उन्हें पूजें आदि ; और दूसरे वे जो मानते हैं कि “अहम् ब्रह्मास्मि” अर्थात – जब मैं अपने ज्ञान पर पड़े परदे से मुक्त हो जाऊंगा – तो मैं ही “ब्रह्म” हो जाऊंगा | मैं कोई व्यक्तिगत राय नहीं दे रही इस बारे में – दोनों ही दर्शन अपनी जगह सही हो सकते हैं | पर यहाँ इस जगह यह कहानी इस सिलसिले में सुनने में आती है | भूमिका यह है कि जहाँ हम रहते हैं, यह वह जगह है जहाँ किष्किन्धा थी – तो यह हनुमान जी की भूमि है – यहाँ वे “आंजनेय ” नाम से अधिक जाने जाते हैं – उनकी माँ अंजना के नाम से … तो कहानी कुछ यूँ है ….

जब रावण की सेना को हरा कर और सीता जी को लेकर श्री राम चन्द्र जी वापस अयोध्या पहुंचे – तो वहां उन सब के लौटने की ख़ुशी में एक बड़े भोज का आयोजन हुआ | वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे – और बेचारे सब ठहरे वानर ही न ? तो सुग्रीव जी ने उन सब को खूब समझाया – देखो – यहाँ हम मेहमान हैं और प्रभु के गाँव के लोग हमारे मेजबान | तुम सब यहाँ खूब अच्छे से पेश आना – हम वानर जाती वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना | 

वानर भी अपनी जाती का मान रखने के लिए तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर श्री सुग्रीव से कहने लगा ” प्रभो – हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार अच्छा रखें, किन्तु हम ठहरे बन्दर | कहीं भूल चूक भी हो सकती है – तो अयोध्या वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे – इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारू रूप से चलाये, कि कही इसी चीज़ के लिए वानर आपस में लड़ने भिड़ने लगें तो हमारी छवि धूमिल होगी |”

अब वानरों में सबसे ज्ञानी, व श्री राम के सर्वप्रिय तो हनुमान ही माने जाते थे – तो यह जिम्मेदारी भी उन पर आई |

भोज के दिन श्री हनुमान सबके बैठने वगैरह का इंतज़ाम करते रहे , और सब को ठीक से बैठने के बाद श्री राम के समीप पहुंचे, तो श्री राम के उन्हें बड़े प्रेम से कहा कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो  | अब हनुमान पशोपेश में आ गए | उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं – वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने वाले थे | न तो उनके लिए बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता (अपने हिंदी भाषी साथियों को बताना चाहूंगी – जैसे उत्तर भारत में पत्तलों में भोज परोसे जाने का रिवाज़ है – उसी तरह यहाँ केले के पत्तों में भोजन परोसा जाता है उत्सवों में और भोजों में |)

तो हनुमान बेचारे पशोपेश में थे – ना प्रभु की आज्ञा ताली जाए, ना उनके साथ खाया जाए | प्रभु तो भक्त के मन की बात जानते हैं ना ? तो वे जान गए कि मेरे हनुमान के लिए केले का पत्ता नहीं है , ना स्थान है | उन्होंने अपनी कृपा से अपने से लगता हनुमान के बैठने जितना स्थान बढ़ा दिया (जिन्होंने इतने बड़े संसार की रचना की हो – वे कर सकते हैं ज़रा से और स्थान की रचना ) | लेकिन प्रभु ने एक और केले का पत्ता नहीं बनाया |

उन्होंने कहा ” हे मेरे प्रिय अति प्रिय छोटे भाई या पुत्र की तरह प्रिय हनुमान | यूं मेरे साथ मेरी ही थाली (केले का पत्ता) में भोजन करो | क्योंकि भक्त और भगवान एक हैं – तो कोई हनुमान को भी पूजे तो मुझे ही प्राप्त करेगा (यह ऐक्वाद का शब्द है) |”

इस पर श्री हनुमान जी बोले – “हे प्रभु – आप मुझे कितने ही अपने बराबर बताएं, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, ना तो कभी हो सकता हूँ – ना ही होने की अभिलाषा है | (यह है द्वैतवाद) – मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा – आपके चरणों में ही मेरा स्थान था – और रहेगा | तो मैं आपकी थाल में से खा ही नहीं सकता | “

तब श्री राम ने अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से ( मिडल फिंगेर ऑफ़ द राईट हैंड ) केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी – जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया | एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में हनुमान को कराया | तो जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते आज भी एक होते हुए भी दो हैं – और दो होते हुए भी एक है |
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