न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात
 यच्छ्होकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां |   
अवाप्यभूमावसपत्नंरिद्धं 
  राज्यं सुराणामपिचाधिपत्यं   ||    

न हि प्रपश्यामि (और न ही मैं देख (पा) रहा हूँ ) मम (मेरे) आपनुद्यत (दूर कर सके ) यत (जो) शोकं (दुःख को ) उच्छोषणं (सुखा देने वाले) इन्द्रियाणाम (इन्द्रियों को) अवाप्य (मिल जाना, पा लेना ) भूमौ (धरती के ) असपत्नं (बिना किसी प्रतिद्वन्धी के) रिद्धम (समृद्ध) राज्यं (राज्य) सुराणाम  (देवताओं का ) अपि (तक भी) च- अधिपत्यम (विजित कर के अधिकार प्राप्त कर लेने पर भी )


अर्जुन ने कहा : मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देख पा रहा जो मेरे इस इन्द्रियों को सुखा डालने वाले शोक को दूर कर सके (जो शोक प्रिय जनों की आसन्न हत्याओं के भय से उत्पन्न हुआ है ) | चाहे मुझे इस विजय से धरती का समृद्ध शत्रुविहीन साम्राज्य मिल जाये , या स्वर्ग का अधिपति ही बन जाऊं, तब भी यह गहन शोक न जाएगा | 

अर्जुन पिछले श्लोक (जिसमे उसने कार्पण्य से उपहत हो कर विवेक खो बैठा हूँ – यह स्वीकार कर के अपने को कृष्ण के शिष्य रूप में समर्पित कर दिया है ) आगे कह रहा है अब | वह अभी कह आया है (पिछले श्लोक में ) कि वह कृष्ण की शरण में है – जो वे कहेंगे वह करेगा | और अभी ही कह रहा है कि मुझे कोई उपाय नहीं दीखता | यह ऐसा नहीं की अर्जुन धोखा दे रहा है कृष्ण को, या विरोधाभास हो उसकी बातों में | वह इतना दुखी है – हाथ पाँव ठन्डे हुए जा रहे हैं, दिमाग काम नहीं कर रहा , खड़े नहीं हो पा रहा , हाथ से गांडीव गिर रहा है |

वह बेचारा (कृपया “बेचारा” शब्द पर विवाद न हो – बेचारा का अर्थ दया का पात्र नहीं होता – इसका अर्थ होता है – वह जिसे कोई चारा / उपाय न सूझ रहा हो ) समझ ही नहीं पा रहा कि मैं अब क्या करूँ, क्या कहूँ, कहाँ जाऊं ……. | सोचिये- उसे किसे मारना है – अपने प्रिय दादा, अपने प्रिय भाइयों, अपने प्रिय भतीजों आदि को – अपने आप को अपने सगे सम्बन्धियों के साथ सोचये – अर्जुन पर क्या गुज़र रही होगी, समझ में आएगा थोडा थोडा | 

परन्तु – यह कर्म – यह परीक्षा – आवश्यक है | उसके अपने लिए नहीं – वरन धर्म की जीत के लिए आवश्यक है | यह विषाद ही उसे प्रभु के प्रति समर्पण के लिए तपा कर कुंदन कर रहा है | और जब ऐसा संपूर्ण समर्पण होगा – तब ही गीता ज्ञान आत्मसात हो पायेगा | नहीं तो तर्क कुतर्क के सिलसिले का क्या है – वह तो अनंत है | 

आज की स्थिति में तो आये दिन लोग सिर्फ एक मकान भर के लिए सगे भाई की हत्या कर देते हैं | कोई लोग अपने अहंकार के पोषण के लिए पिता तुल्य व्यक्ति को व्यंग्य बाण मार मार कर इतनी मानसिक प्रतारणा देते हैं की वे खून के आंसू रोयें | पुत्र और पुत्रियाँ ( और पुत्रवधुएँ और दामाद) अपने जीते जागते बुजुर्गों को मानसिक आघात कर कर के इतना दुखित कर देते हैं की वह बुज़ुर्ग ईश्वर से मृत्यु मांगने लगे | इसी मानसिकता के कारण आज हमारी भारत भूमि पर old age homes स्थापित हैं😦 | 


लेकिन यहाँ अर्जुन कह रहा है कि (इन सब प्रिय जनों के बिना जीवन की कल्पना से भी ) जो मुझे कलेजे को चीर देने वाला दुःख हो रहा है- यह संताप तो स्वर्ग प्राप्त भी हो जाए – पर फिर भी नहीं जा सकता | वह धर्म अधर्म सब भूल गया है अभी इस मार्मिक दुःख से | यह भी भूल गया है कि इस युद्ध से वह ये सारे साम्राज्य जीतने को प्रयत्नरत भी नहीं है | उसे सिर्फ और सिर्फ अँधेरा नज़र आ रहा है | 


इसके विपरीत दुर्योधन है – जिसकी और से पितामह लड़ रहे हैं | पर दुर्योधनी मानसिकता उन्हें सिर्फ एक योद्धा के रूप में देखती है | यदि उनकी मृत्यु हो गयी इसमें – तो जो नुक्सान होगा – वह सैनिक दृष्टी से तो उसे चोट देगा, किन्तु भावनात्मक कोई चोट न लगेगी | उसके लिए अपने बुज़ुर्ग सिर्फ शतरंज की बिसात की गोटियाँ हैं (या कहें कि द्यूत की ?) – जिन्हें वह सिर्फ अपनी जीत के उद्देश्य से उपयोग में ला रहा है | उसे उनकी भयंकर मानसिक पीड़ा से ( जो उसके कर्मों से उत्पन्न हो रही है ) या उनकी संभावित मृत्यु से भी – कोई तकलीफ नहीं होती है |

ध्यान देने की बात है कि – सिर्फ गीता के गायन से और उसके श्रवण भर से ही इस पीडादायी मनोस्थिति में पड़ा यह अर्जुन इस विषाद से निकल सका | यह इसलिए संभव हुआ कि उसने पूरी श्रद्धा से सुना, समझा और मनन किया |

ऐसा नहीं है कि उसने प्रति प्रश्न पूछे न हों – पूछे – अवश्य पूछे – बार बार पूछे  | परन्तु उन प्रश्नों का उद्देश्य कृष्ण की बात काटना नहीं था, बल्कि उनकी बात समझना था | 

मैं बार बार यही कहती रहती हूँ कि – हम क्या कर रहे हैं – इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम वह क्यों कर रहे हैं, किस भावना से प्रेरित हो कर कर रहे हैं | 

यह सिर्फ अर्जुन पर उस वक़्त नहीं – बल्कि हम में से हर एक पर – हर वक़्त, हर स्थति में लागू होता है | कई बार हमारा कर्त्तव्य ऐसा कुछ होता है – जो हमें कड़वा भी लगता है | तब – उस कर्त्तव्य को सामने देख कर ही हम मोहवश पस्त पड़ जाते हैं | कुतर्क भी करते हैं – ज्ञानियों जैसी बातें भी बनाते हैं | परन्तु यह ज्ञान नहीं होता, ज्ञान का छलावा भर होता है | परन्तु यदि कृष्ण जैसा सदगुरु मिले – और अर्जुन सा समर्पित शिष्य – तो संशय दूर होते समय नहीं लगता | 


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