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नत्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव नभविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।


न नहीं तु किन्तु एव निश्चित तौर पर अहम् मैं  जातु किसी भी समय  न असं  नहीं थे / अस्तित्व में थे  न नहीं त्वम तुम न  नहीं  इमे  ये सब जनाधिपाः  राजा जन न  नहीं  च भी एव निश्चित तौर पर  न  नहीं  भविष्यामः भविष्य में सर्वे वयम हम सब अतः परम इस काल के पश्चात ।

 

(श्री कृष्ण आगे अर्जुन से बोले – )

 

निश्चित ही पूर्व में ऐसा कोई काल नहीं था जब तू नहीं था, या मैं नहीं था या ये सब राजागण नहीं थे । न ही आगे ऐसा कोई काल होगा जब हम सब नहीं होंगे ।

 

 

यह श्लोक यह कहता है कि जो भी है – सब स्थायी है – सिर्फ रूप बदलते हैं । विज्ञान भी कहता है – law of conservation of energy and matter – बाह्य रूप में बदलाव आ सकता है – परन्तु न तो नया कुछ बन सकता है – न ही विनष्ट हो सकता है । हम सभी जीव समय के भी पूर्व से हैं – और समय चक्र के आगे भी होंगे । किस रूप में होंगे ? हम में से कोई नहीं जानता ।

 

यह कृष्ण इसलिए कह रहे हैं कि अर्जुन घोर विषाद में है । वह अपने पितामह भीष्म और गुरु द्रोण आदि की संभावित मृत्यु (बल्कि शायद स्वयं अपने ही हाथ से मृत्यु ) से भयभीत है – कि वे सब न होंगे – तो मैं जीत कर भी क्या करूंगा । कृष्ण कह रहे हैं कि यह संभव ही नहीं कि ये नहीं होंगे – क्योंकि कुछ भी विनष्ट हो ही नहीं सकता है ।

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देहिनोSअस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति  || 

 

देहिनो शरीर में रहने वाला (आत्मा / जीव ) अस्मिन इसमें  यथा जिस तरह से  देहे देह में/ शरीर में कौमारं लड़कपन यौवनं युवावस्था जरा बुढापा तथा उसी तरह से देह अन्तर देह का बदलाव (मृत्यु और दूसरा जन्म)  प्राप्तिः होता है धीरः समझदार तत्र  इस सब से न नहीं मुह्यति मोहित होता हैं ।

 

जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा अपरिवर्तित ही रह कर लगातार बदलते हुए शरीर में वास करता है (शरीर बालक से जवान होता है, फिर बूढा भी परन्तु उसके भीतर रहने वाला व्यक्ति वही रहता है ) उसी तरह मृत्यु के समय भी वही आत्मा एक से दूसरे शरीर में पुनर्वास कर लेता है | जो यह जानते हैं , वे मोहित नहीं होते ।

 

यह बात गीता के मुख्य ज्ञान से जुडी हुई है । यह सच है – यह हम सब का अनुभव है । हम आज जिस वयस / उम्र के हैं – पांच साल पहले इससे पांच वर्ष छोटे थे, पांच साल बाद [ यदि इसी शरीर में जीवित ही रहे तो🙂 ] इससे पांच साल बड़े हो जायेंगे । परन्तु – शरीर में जो भी बदलाव आये हैं – (शायद पहले के अपेक्षा हम अब थकते ज्यादा हों , आदि आदि ) , किन्तु हम व्यक्ति तो वही हैं जो पांच साल पहले थे ।

 

शायद कुछ नए अनुभव और नयी यादें जुड़ गयी हैं हमसे, परन्तु बुनियादी तौर पर हम नहीं बदले हैं ।

 

इसी तरह ( कृष्ण कह रहे हैं ) जब मृत्यु होगी – तब भी हम वही रहेंगे , सिर्फ जो जीव इस शरीर के बदलते रूपों में अपरिवर्तित रहता रहा इतने समय , वही एक और नए बदले हुए शरीर में चला जाएगा । जीव नहीं बदलेगा , यह सिर्फ इस present वाले बदलते शरीर से, एक नए बदलते शरीर में पुनर्वासित हो जाएगा ।

 

एक मकान बना – उसमे हम रहे । नए से पुराना हुआ, जर्जर, फिर रहने लायक न रहा । तो उसके निवासी दूसरे मकान में चले गए (जो फिर से पुराना होने ही वाला है, टूटने ही वाला है )। मृत्यु सिर्फ एक मकान का बदलाव भर है, और कुछ नहीं ।

 

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जारी 


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disclaimer:

कई दिनों से इच्छा थी, कि भगवद गीता की अपनी समझ पर लिखूं – पर डर सा लगता है – शुरू करते हुए भी – कि कहाँ मैं और कहाँ गीता पर कुछ लिखने की काबिलियत ?| लेकिन दोस्तों – आज से इस लेबल पर शुरुआत कर रही हूँ – यदि आपके विश्लेषण के हिसाब से यह मेल ना खाता हो – तो you are welcome to comment – फिर डिस्कशन करेंगे …. यह जो भी लिख रही हूँ इस श्रंखला में, यह मेरा interpretation है, मैं इसके सही ही होने का कोई दावा नहीं कर रही  

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मेरे निजी जीवन में गीता जी में समझाए गए गुण नहीं उतरे हैं । मैं गीता जी की एक अध्येता भर हूँ, और साधारण परिस्थितियों वाली उतनी ही साधारण मनुष्य हूँ जितने यहाँ के अधिकतर पाठक गण हैं (सब नहीं – कुछ बहुत ज्ञानी या आदर्श हो सकते हैं) । गीता जी में कही गयी बातों को पढने / समझने / और आपस में बांटने का प्रयास भर कर रही हूँ , किन्तु मैं स्वयं उन ऊंचे आदर्शों पर अपने निजी जीवन में खरी उतरने का कोई दावा नहीं कर रही । न ही मैं अपनी कही बातों के “सही” होने का कोई दावा कर रही हूँ।   मैं पाखंडी नहीं हूँ, और भली तरह जानती हूँ  कि मुझमे अपनी बहुत सी कमियां और कमजोरियां हैं । मैं कई ऐसे इश्वर में आस्था न रखने वाले व्यक्तियों को जानती हूँ , जो वेदों की ऋचाओं को भली प्रकार प्रस्तुत करते हैं । कृपया सिर्फ इस मिल बाँट कर इस अमृतमयी गीता के पठन करने के प्रयास के कारण मुझे विदुषी न समझें (न पाखंडी ही) | कृष्ण गीता में एक दूसरी जगह कहते हैं की चार प्रकार के लोग इस खोज में उतरते हैं, और उनमे से सर्वोच्च स्तर है “ज्ञानी” – और मैं उस श्रेणी में नहीं आती हूँ ।